-महावीर सांगलीकर
मै मानता हूं कि ओशो एक महान विचारक थे. उन्होंने बिना किसी की परवाह किये बहुत सारी बातें दुनिया के सामने रखी. उनके विचारों के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए. लोगों ने अपने विचार करने के तरीके में बदलाव किया. ओशो की विशेषता यह थी की वे किसी एक दर्शन से, एक धर्म से जुड़े हुए नहीं थे. वे जैन, बौद्ध, वैदिक, इस्लाम, इसाई और बाकी अनेक धर्मों के विचारों पर अपने मत रखा करते थे.
फिर भी ओशो के विचारों में, विचारों को रखने के तरीकों में कई खामियां थी. पक्षपात था. अगर आपने ओशो के प्रवचन सुने है, तो कभी आपने उन खामियों और पक्षपात पर गौर किया है?
ओशो महावीर, गौतम बुद्ध, कृष्ण, जीजस, मोहमद, कबीर इन सबके बारे में हमेशा अच्छा ही बोलते थे. लेकिन वह राम की हमेशा आलोचना करते थे. नए युग के जितने भी दार्शनिक हो गये है उनके बारे में ओशो शायद ही कभी अच्छा बोलते थे. उन्होंने ना विवेकानंद को छोड़ा, ना महात्मा गांधी को. वे हमेशा ब्राम्हणों और जैनियों की, हिंदुओं की, भारतीयों की कड़वी आलोचना करते थे. लेकिन बौद्धों और मुसलमानों के खिलाफ वे कभी नहीं बोलते थे. इसके पीछे क्या राज था? मेरे विचारों में कारण यही हो सकता है कि बौद्ध और मुसलमान सॉफ्ट टार्गेट नहीं थे.
लेकिन इससे भी बुरी बात यह थी कि ओशो अपने प्रवचनों में सिंधियों का, मारवाडियों का, सरदारजी का मजाक उड़ाते थे. मजाक उडाने के तरीकों में बचपना तो था ही, साथ ही इन लोगों को वे बुद्धू समजते थे. यहां भी उनका पक्षपात देखिये... वे कभी उत्तर भारतीयों का, दक्षिण भारतीयों का, गुजरातीयों का, मराठीयों का मजाक नहीं उड़ाते थे.
ओशो उत्तर भारत के संतों के विचार अपने प्रवचनों में रखते थे, लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के संतो के विचार शायद ही रखे हो. संभावना यह है कि ओशो दक्षिण के संतों के बारे में जानते ही न थे, या जानकर भी बोलना नहीं चाहते थे.
ओशो के प्रवचनों को आप गौर से सुनिए. उनके जादातर प्रवचनों में अहंकार और निराशावाद इन दोनों बातों की झलक मिलेगी.
ओशो का खुद का कोई दर्शन नहीं था. चूं कि वह एक प्रोफेसर थे, प्रवचन देते समय भी प्रोफेसर ही बने रहे. उन्होंने अपने नहीं, प्राचिन दार्शनिकों के विचारों को लोगों के सामने रखा. यह विचार रखते समय उन्होंने पक्षपात, अहंकार और हताशा दिखाई. वे सेक्स इस विषय पर जरुरत से जादा बोलते थे.
ओशो की हताशा का राज ओशो ही जाने!
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